एक भारत-श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को साकार करता कुंभ।

हमारे प्राचीन भारतीय सामाजिक विचारकों व मनीषियों ने राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने एवं भारतीय ज्ञान परम्परा को समृद्ध करने के लिए अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक प्रबन्ध किये। इन्ही प्रयत्नों के परिणामस्वरूप भारतवर्ष में राष्ट्रीय एकता की एक ऐसी नींव पड़ी जिसने सदियों तक भारतभूमि को एक सूत्र में बाँधे रखा।
यद्यपि मुस्लिम आक्रांताओं एवं जिहादी विचारधारा ने अखंड भारत के भौगोलिक स्वरूप को कुछ क्षति पहुंचाई है। लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद हमारी सांस्कृतिक एकता कायम रही है।
तभी इतनी अलग-अलग तरह की भाषाएँ, रंगरूप, पहनावा, खानपान, वेशभूषा, पूजा पद्धति होने के बाद भी हम भारतीय एक हैं।
ऐसे में हमारा उन प्रयत्नों को जानना एवं समझना आवश्यक हो जाता है जिसने सदियों से हमारी भारतीय संस्कृति को पोषित कर हमें भारतवंशियों को एकजुट किया है।
इन्ही प्रयत्नों में से एक है कुंभ का आयोजन।

प्राचीनकाल से ही भारत के चार प्रमुख स्थानों पर, बारह वर्षों के अंतराल पर कुंभ का आयोजन किया जाता रहा है। ये स्थान हैं- प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक। स्कन्द पुराण, भविष्य पुराण, अग्नि पुराण, ब्रह्मपुराण सहित कई ग्रंथों में कुंभ से जुड़ी कथाओं का विस्तृत वर्णन है।
ऐसी मान्यता है कि क्षीरसागर मंथन के पश्चात निकले अमृत कलश को पाने के लिए देवताओं और असुरों में संघर्ष हो गया। इसी संघर्ष के दौरान चार सतह पर अमृत की कुछ बूंदें गिरी थी। इन्ही चार स्थानों पर कुंभ आयोजित किए जाते हैं।
ऐतिहासिक रूप से कुंभ का प्रथम उल्लेख 6-7वीं सदी के चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत में मिलता है। ह्वेनसांग राजा हर्ष के शासनकाल में भारत आये थे। अपनी यात्रा वृतांत में उन्होंने कुंभ और उससे जुड़े तत्कालीन भारतीय समाज के बारे में लिखा है।
ऐतिहासिक ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि, पहले कुंभ के अवसर पर पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण के विद्वान एक स्थान पर जुटकर चिंतन-मनन किया करते थे। धर्म-अध्यात्म, योग, आयुर्वेद, दर्शन, कला, साहित्य तमान विषयों पर सकारात्मक संवाद व प्रदर्शन होते थे। इसके माध्यम से एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र की भाषा, वेशभूषा, खानपान, सहित्य, कला आदि से रूबरू होते थे। ज्ञान,कला के इस संगम से पहले से ही समृद्ध भारतीय संस्कृति और समृद्ध होती थी।
लेकिन कालांतर में कुंभ को विशुद्द धार्मिक रूप देकर इसके सामाजिक व सांस्कृतिक पहलुओं की अनदेखी की गई। जिसके फलस्वरूप राष्ट्रीय एकता का परिचायक कुंभ डुबकी लगाने और कर्मकांडो तक ही सीमित हो गया।
लेकिन खुशी की बात है कि इसबार के कुंभ(प्रयागराज-2019) में इसके सांस्कृतिक पहलू की अनदेखी नहीं की गई। यहाँ धर्म-आध्यात्म के साथ-साथ कला-साहित्य का भी संगम हुआ।

इसबार पूरे मेला क्षेत्र में करीब 6000 पंडाल लगे थे जिसमें से कई तो केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए ही लगाए गए थे। इसके अलावा भी अलग-अलग अखाड़ों एवं अन्य धार्मिक संगठनों के शिविरों में समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत हुई।
इसी कड़ी में संस्कार भारती द्वारा आयोजित कार्यक्रम, ‘अपना पूर्वोत्तर-एक झलक’ ने एक अलग छाप छोड़ी। मेला क्षेत्र के सेक्टर साथ में बना यह शिविर पूरी तरह से कला को समर्पित था।
वैसे तो “सा कला या विमुक्तये” के उद्धघोष के साथ संस्कार भारती कलाओं के संरक्षण, संवर्धन में 1981 से निरन्तर कार्यरत है। लेकिन इसबार का कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि यह पूरी तरह से पूर्वोत्तर भारत की लोक, उपशास्त्रीय एवं शास्त्रीय कलाओं को समर्पित था। संस्कार भारती का कलाओं के प्रति इसी समर्पण भाव का परिणाम है कि इसबार के प्रयागराज कुंभ में, 15 जनवरी से 4 मार्च तक पूर्वोत्तर भारत की एक झलक को शेष भारत के सामने लाया गया। कुंभ के अवसर पर पूर्वोत्तर की समृद्ध लोककलाओं, जीवनशैली, खानपान, वेशभूषा के प्रदर्शन की योजना बनी एवं उसे मूर्त रूप दिया गया। इसके लिए तीन हज़ार से अधिक कलासाधको को पूर्वोत्तर से कुंभ बुलाया गया। सिक्किम समेत पूर्वोत्तर के आठों राज्यों से कलाकार आये। कार्यक्रम ‘अपना पूर्वोत्तर-एक झलक’ अपने आप मे कितनी सांस्कृतिक विविधता को समेटे हुए था इसकी बानगी देखिये-
एक राष्ट्र, आठ राज्य, पचास दिन, सौ से अधिक जनजाति समुहों के तीन हजार से अधिक कलाकार, पाँच सौ प्रस्तुतियां, बीस शोभायात्रा!
सभी पूर्वोत्तर पर आधारित, पूर्वोत्तर से सैकड़ों किलोमीटर दूर प्रयाग की धरती पर। एक भारत-श्रेष्ठ भारत की दिशा में इससे बढ़िया कदम और क्या हो सकता है।
दो एकड़ के परिसर में फैला ‘अपना पूर्वोत्तर’ शिविर अपने नाम के अनुरूप ही पूरी तरह से पूर्वोत्तर के रंग में रंगा हुआ था। शिविर में ही नागा मोरंग, चांघर, असम हाउस, मिज़ोरम हाउस, त्रिपुरा यूनिवर्सिटी की प्रतिकृति, असम के प्रसिद्ध एक सिंघ वाले गैंडे की प्रतिकृति के अलावा वनवासी जीवन शैली को दिखाती मूर्तियां भी बनाई गई थी। यहाँ जितनी भी कलाकृतियां बनाई गई थी उनका पूर्वोत्तर के सामाजिक जीवन मे काफी महत्व है। नागा मोरंग का इस्तेमाल नागा जनजाति के लोग सामुदायिक केंद्र के रूप में करते हैं। चांघर अरुणाचल के निसि व गालो जनजाति का पूजाघर है। चाँद व सूर्य देवता को समर्पित इस पूजाघर को पूर्वोत्तर के हरेक निसि या गालो गाँव मे देखा जा सकता है।
यहाँ एक प्रदर्शनी कक्ष भी बनाया गया था। जहाँ पूर्वोत्तर से जुड़े चित्रों, तस्वीरों, पोशाक आदि का प्रदर्शन किया गया। पचास दिन के कार्यक्रम के दौरान बीच मे दो बार चित्रकला कार्यशाला का भी आयोजन हुआ। इसमें पूर्वोत्तर समेत देशभर से आये प्रसिद्ध चित्रकारों ने कुंभ और पूर्वोत्तर विषय पर चित्रकारी की। उनके बनाये चित्रों को प्रदर्शन के लिए भी रखा गया। कृष्ण-रुक्मिणी विवाह, भीम-हिडिम्बा विवाह, परशुराम कुंड, कामरूप-कामाख्या, बसंत रास, मां त्रिपुर सुंदरी आदि विषय पर बनी चित्रों को यहां काफी सराहा गया।

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