प्रयागराज का अभूतपूर्व कुंभ : एक अविस्मरणीय अनुभव!! – – – – स्वर्ण अनिल ।

प्रयागराज का अभूतपूर्व कुंभ : एक अविस्मरणीय अनुभव!! – – – – स्वर्ण अनिल ।

वसंत पंचमी की पूजा के बाद प्रयागराज के अर्धकुंभ में आना मेरे लिए अविस्मरणीय अनुभव रहा। उत्सवधर्मी मेरा देश, कुंभ मेले की भूमि पर सभी देशी-विदेशी तीर्थयात्रियों को कैसे आनंद से सराबोर कर रहा है! यह यहां आए बिना समझना मुश्किल है।टी. वी, इंटरनेट, संचार व प्रचार के सभी साधन इसे अपनी-अपनी तस्वीरों और शब्दों में वर्णित कर ही नहीं सकते – – – – यह यहीं आकर समझ आया !!

भारतवर्ष के जन-जन के उत्साह और उल्लास से प्रयागराज का पूरा क्षेत्र हमें खुशियों के प्रांगण सा दिखाई दिया। त्रिवेणी की पावन बालू पर, इस छोर से – – उस छोर तक जहां भी नज़र जाती है हंसते-मुस्कुराते, गंगा मैया की जय जयकार करता हिलोरे लेता विशाल जनसागर दिखाई दे रहा है !! इससे भी अद्भुत हमारे लिए यह है कि यहाँ पूरे विश्व से आए लोगों की भीड़ है ? भीड़ नहीं एक अनुशासित और शांत जीवन-चर्या से जुड़े एक ही कुटुंब के सदस्यों की तरह व्यवहार करते आत्मीय-जन हैं !!
“टैंट-नगर” ‘ की ओर जाते हुए हमनें देखा कि दोनों ओर कतार बांधे खड़े पेड़ों पर लोक- कलाओं की पूरी दुनिया स्वागत कर रही है । सच में – – घर पर , विभिन्न पर्वों पर, भारत भर के नगर- देहातों में दादी, नानी,मां,बहनों, बेटियों कि हाथों से बनाए जाने वाले लोक शैलियों के चित्रों को कुंभ मेले में झूमते लहराते पेड़ों पर देखना मनोहारी है।

अपनी अद्वितीय विशेषताओं के कारण दिसंबर 2017 में, यूनेस्को द्वारा, “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर” ( साधारण शब्दों में ” विश्व धरोहर”) घोषित किए गए हमारे “कुम्भ-पर्व” को भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठित सरल,सहज,लोक-परंपराओं से जोड़ने वाले सभी प्रांतों के कलाकारों को नमन!
पेड़ों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति व इतिहास को उजागर करते चित्र प्रयागराज की इमारतों को भी सजा रहे हैं। माँ गंगा- यमुना व अदृश्य सरस्वती की रेती पर बसे पंडालों के भव्य नगरों को देखना अपने आप में अनोखा तो था ही साथ ही अप्रतिम था मेला मार्ग पर लोहे की सड़कों का जाल!! हमें बताया गया कि यह सड़कें आम सड़को की अपेक्षा अलग किस्म की हैं। लोहे की सड़कें ना तो धसती हैं, ना ही इन पर चलते हुए धचके लगते हैं ना ही कोई खड़खड़ाहट होती है । रेत पर फैली इन चौड़ी सड़कों ने आवागमन को सरलता दी तो तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए, शटल बसें, शौचालयों, कुड़ेदानों की समुचित उपलब्धता , (पहली बार) संगम स्नान /गंगा स्नान के लिए समुचित घाटों का प्रबंध, कपड़े बदलने हेतु स्त्रियों के लिए केबिन(पहली बार ) , स्वास्थ्य सेवाएं आदि आवश्यक सुविधाओं ने – पूरे मेला क्षेत्र को एक सराहनीय सुव्यवस्था दी है। इस अभूतपूर्व कुम्भ में एक अभूतपूर्व कार्य यह भी है कि चौदह(१४) वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को प्रवेशद्वार से ही
‘रेडियो फ्रीक्वेंसी आईडेंटिफिकेशन चिप ‘ लगाकर भेजा जा रहा है ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनकी गतिविधियों को देखकर ढूंढा जा सके—- और फ़िल्मों के माध्यम से लंबे समय से प्रचारित कुंभ के मेले में बिछुड़ने की कथाओं को पूरी तरह विराम मिल जाए ।
गंगा आरती के समय, पानी पर तैरते विदेशों से आए पक्षियों की सुंदर कतारें और केसर घुले चंदन सी सूर्य किरणों की चुनरी ओढ़ कर नृत्य करती लहरों ने ऐसा आलौकिक वातावरण निर्मित किया जिसे शब्दों में बांधना असंभव है। इस निर्मल आनंद की अनुभूति को सामूहिक आरती में प्रज्वलित दीपों के साथ गूंजते गंगा मैया की आरती के स्वरों नें और दिव्य बना दिया। इस दिव्यता के भाव को रोम रोम तक पहुंचाया सुप्रसिद्ध लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी जी की “गंगा तोरी लहर सबई के मन भाई, तिरबेनी तोरी लहर सबई के मन भाई ‘ की सुमधुर स्वर लहरियों नें। वहां उपस्थित देश-विदेश के कलाविदों और जनसमूह ने मालिनी जी के सुर में सुर मिला कर जो समा बांधा मुझे ऐसा लगा कि धरती की गंगा को समर्पित गीत के सुर आकाश और पाताल में त्रिपथगा तक पहुंच रहे हैं। सत्य तो यह है कि भारतीय संस्कृति के वासुधैव कुटुम्बकम् एवं आनंदतत्व को समझने के लिए केवल महंगे-मंहगे विद्यालयों की चारदीवारी नहीं वरन् भारतीय उत्सवों के पारंपरिक परिवेश में भागीदारी निभाने की आवश्यकता है। कुंभ क्षेत्र के 30 द्वारों की सुंदर परिकल्पना के पीछे भी कहीं न कहीं भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़नेऔर उनके पीछे की कथाओं को जानने की जिज्ञासाओं को जगाने के भाव मुझे साफ़ नज़र आए। मुझे प्रसन्नता हुई जब ‘ऐरावत द्वार’ के बारे में एक 8 वर्षीय बच्ची से मैनें यूं ही पूछ लिया, “हाथी वाला द्वार देखा, अच्छा लगा?” तो उसने जवाब दिया कि वो हाथी नहीं ऐरावत है। कौन ऐरावत के प्रत्युत्तर में उसने मुझे समुद्र मंथन की कथा सुना दी!! मैनें गदगद भाव से सुनी। ऐसी कितनी बाते हैं जिसने हमें आश्वस्त किया। कौन कहता है कि आज की नई पीढ़ी को भारत की भारतीय संस्कृति की पौराणिक कथाओं से कुछ लेना देना नहीं है?

तीन दिन के अपने प्रवास में पूरे कुंभ मेले को देखना तो मेरे लिए संभव नहीं था परंतु जो कुछ देखा और पाया वह संभावना से बहुत अधिक था।
मेरे दृष्टिकोण में, हमारे ऋषि-मुनियों ने जिन को मैं शोधार्थी/ रिसर्च स्कॉलर मानती हूँ युगो से वैदिक साहित्य ,पौराणिक साहित्य आदि भारतीय साहित्य के माध्यम से यह घोषणा करते हैं कि “कुंभ-पर्व” पर ग्रह-नक्षत्रों की विशिष्ट स्थितियों में विशिष्ट स्थानों के जल में स्नान, शरीर की पुष्टि करता है एवं स्नान के बाद का सामूहिक अध्ययन चिंतन अपने कालखंड की समसामयिक स्थितियों पर शोध कर सम्पूर्ण समाज के मार्गदर्शन के लिए नए मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसी चिंतन कुंभ से जन्मती है चरैवेती-चरैवेती की चिरंतन भारतीय परंपरा।
वर्तमान में गोस्वामी तुलसीदास जी की विश्वविश्रुत “रामचरितमानस ” के बाल-कांड का ‘भरद्वाज-याज्ञवल्क्य-संवाद’ भी इसी सत्य को उजागर करता है :—-
*माघ मकरगत रबि जब होई।तीरथपतिहिं आव सब कोई
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।
माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं, तब सब तीर्थराज प्रयाग आते हैं। देवता,दानव, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी स्नान करते हैं।


*ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
ककहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥44॥
भारतीय परंपरा में “कुंभ” स्नान के साथ-साथ सृष्टि के मूल तत्व के निरूपण, धर्म (पंच भूतों ; अग्नि,जल,वायु, पृथ्वी, आकाश /ईथर की प्रवृत्ति) विभिन्न तत्वों, विभागों, भक्ति भगवंत के संयुक्त ज्ञान और वैराग्य का वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्य से युक्त भगवान्‌ की भक्ति पर परिचर्चा करते हैं।

बालकांड के इसी संवाद में भरद्वाज मुनि की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए संत शिरोमणि तुलसीदास जी कहते हैं–

*एक बार भरि मकर नहाए।सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥
जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥2

एक बार पूरे मकर भर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने अपने आश्रमों को लौट गए।परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनि को चरण पकड़कर भरद्वाजजी ने रोक लिया॥

रामचरितमानस की ये पंक्तियाँ बचपन में मुझे हमेशा अचरज में डालती थीं परंतु समझ आने पर गौरवान्वित करती हैं – – – – क्योंकि वे भरद्वाज मुनि जो श्रीराम को वनवास में मार्ग दिखाते हैं ! भरत के राम की खोज में आने पर उचित अतिथि सत्कार के लिए, जिनके तपोबल के सम्मुख रिद्धि-सिद्धि भी नतमस्तक होकर अतिथियों का स्वागत करती है ! वे भरद्वाज जी चरण पकड़ कर याज्ञवल्क्य जी को परम विवेकी मान कर रोक लेते हैं? विद्वतजनों का आपस का विनम्र भाव, परस्पर परिचर्चा की, संवाद की परंपरा – भारतीय संस्कृति की अविच्छिन्न और अप्रतिम धरोहर है ।
आजकल होने वाली अधिकांश संगोष्ठियों में, मैंने देखा है, अपनी बात कह कर,वाहवाही की उम्मीद रखने वाले अधिकांश वक्ताओं के पास दूसरों की बात सुनने का धैर्य प्रायः कम ही दिखाई देता है। परंतु ‘परमार्थ निकेतन परिसर, अरैल घाट सेक्टर 18’ में – 12 फरवरी से 14 फरवरी तक देशभर के प्रतिष्ठित कलाकारों साहित्यकारों सिने जगत के गणमान्य लोगों की भागीदारी और सानिध्य में जिस “संस्कृति विद्वत कुम्भ” का आयोजन हुआ उसके सत्रों में व्याख्यान देने वाले विद्वानों तथा प्रत्येक सत्रांत में परिचर्चा में भाग लेने वाले सुधी श्रोताओं ,सभी में मैंने सहृदय भावक सी ही विनम्रता देखी । ” संस्कृति विद्वत कुम्भ” की त्रिदिवसीय संगोष्ठियों का हिस्सा होना साहित्य के विद्यार्थी के नाते मेरे लिए अपने आप में एक अविस्मरणीय अनुभव रहा है।

“संस्कृति विद्वत कुम्भ” ने मुझे भारतीय संस्कृति के उस पृष्ठ का स्मरण भी करवा दिया जिस पृष्ठ पर, वैदिक सप्तर्षियों की नामावली में वर्णित” महर्षि शौनक” का नाम है। दस हज़ार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर ‘कुलपति’ का विलक्षण सम्मान हासिल करनेवाले प्रथम आचार्य महर्षि शौनक के मन में जब तत्कालीन समाज, समसामयिक परिवेश की विसंगतियों को दूर करने के लिए वैचारिक-मंथन एवं शोध के लिए ज्ञानसत्र करने की इच्छा जागी तो उन्होंने”नैमिषारण्य” की भूमि पर ८८ हज़ार ऋषियों को साथ लेकर संवाद सत्र किया था।
” मीडिया की नैतिक ज़िम्मेदारी, सिनेमा और समाज, संगीत का लोक, नारी विमर्श का बदलता स्वरूप, ज़मीन छोड़ती परंपराएं, कला परंपराओं की सामाजिक ज़िम्मेदारी ” जैसे समसामयिक विषयों पर गंभीर और गहन चिंतन द्वारा नई पीढ़ी के लिए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उत्तर व समाधान खोजने की इस प्रक्रिया में भारतीय समाज के प्रायः सभी वर्गों ने अपनी सकारात्मक भागीदारी निभाई।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल माननीय केसरीनाथ त्रिपाठी जी, सुलझे हुए राजनेता शिवराज सिंह चौहान जी, परमार्थ निकेतन केअध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि जी जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर श्री अवधेशानंद, संस्कार भारती के संस्थापक और संरक्षक कलाऋषि बाबा योगेंद्र जी, संस्कार भारती के कर्मयोगी महामंत्री श्री अमीर चंद जी, साध्वी डॉ भगवती सरस्वती, कत्थक नृत्यांगना सरोजा वैद्यनाथन, प्रतिभा प्रह्लाद, शारदी सैकिया, पार्श्व गायिका हेमलता, संगीत आचार्य राजेश्वर आचार्य जी, ध्रुपद गायक वसीफ़ुद्दीन डागर, लोक गायिका मालिनी अवस्थी, फ़िल्म निर्देशक डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी, सुभाष घई और मधुर भंडारकर, रंगकर्मी वामन केंद्रे एवं सलीम आरिफ़ व लुबना आरिफ़ , कवि व चित्रकार बाबा सत्यनारायण मौर्य, चित्रकार श्याम शर्मा, साहित्यकार नीरजा माधव, सच्चिदानंद जोशी व दर्शक हाथी, पत्रकार रोहित सरदाना ऋचा अनिरुद्ध व शेफाली वैद्य आदि पद्मभूषण,पद्मश्री से सम्मानित इन मनीषियों को सुनना और जिज्ञासाओं का समाधान पाना अद्वितीय अनुभव था।
भारतीय अस्मिता युगो से आचार्यों व ऋषि मुनियों से मिले दिशा निर्देश को स्वीकारती रही है फिर वो चाहे सामान्य जन हों या सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग। इस परिचर्चा में भी आध्यात्मिक जगत से जुड़े’स्वामी चिदानंद मुनि जी’ का वक्तव्य मुझे इसी सच को उद्घाटित करता हुआ लगा। उन्होंने कहा “भारत इसलिए महान है क्योंकि हिमालय सी ऊंचाई सागर सी गहराई और गंगा सी पवित्रता रखने वालों का संगम यहां है।” उन्होंने इस वैचारिक कुम्भ को अपनी परंपराओं को जानने और जड़ों से जुड़ने का माध्यम बताते हुए एक आग्रह भी किया कि, कि संगम की इस धरती से, ‘संस्कार भारती’ एक नया संस्कार दें कि जिस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में प्रधानमंत्री जी के प्रयासों के कारण 177 देशों की स्वीकृति से भारतीय योग की परंपरा को प्रतिष्ठा मिली और ‘विश्व योग दिवस’ मनाने की परंपरा शुरू हुई उसी तरह विश्व एकात्मता दिवस(World Oneness Day) विश्व एकजुटता/ घनिष्ठता दिवस( World Togetherness Day) मनाने के लिए एक नया प्रस्ताव लाए। यही है सर्वे भवंतु सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम् का मंत्र। पूरा विश्व आज आतंकवाद से थक चुका है, आध्यात्म एकात्मता (Oneness) की बात करता है! तंग दिल नहीं यंग दिल की बात करता है। आज 90%जवान लोग हैं और बाकी वे जो अपने को जवान मानते हैं। सागर मंथन हुआ था आज स्वयं के मंथन की बारी है आत्ममंथन सेअमृत मंथन की ओर चलना है।
महामहिम केसरी नाथ जी ने स्पष्ट किया कि जब कहा जाता है गंगा में पाप धोने आते हैं तो पाप से अभिप्राय विकृतियों से होता है । उन्होंने कुंभ को विकृतियों से मुक्ति का पर्व मानते हुए बताया जो अमानवीय है सामाजिक मान्यता के विरुद्ध विचार ही विकृति है। आध्यात्म की प्रेरणा से पाला पोसा संस्कार हमें विकृतियों को दूर करने की प्रेरणा देता है,हृदय को शुद्ध कर ईश्वर से जोड़ता है। राजनेता शिवराज सिंह चौहान जी ने मानव के पूर्ण विकास को शरीर, मन और आत्मा के उत्थान से जोड़ा। इसके साथ ही उन्होंने समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए दो बड़ी समस्याओं को समाप्त करने की दिशा में प्रयास करने के लिए आह्वान किया १) जातिवाद , २)स्त्री और पुरुष में भेद।
कोकिल कंठी पार्श्वगायिका हेमलता जी नें गदगद् भाव से अपने एक गीत पाने की छटपटाहट से शुरू हुई 40 भाषाओं में 5700 गीतों की यात्रा का वर्णन किया और रामचरितमानस के दोहों मधुर गान।
सरोजा वैद्यनाथन जी ने भारतीय संतो को भारतीय अखंडता को कलाओं के माध्यम से जीवित रखने श्रेय दिया।
यतींद्र मिश्र जी के प्रश्न, लोक के अनुगमन से क्या शास्त्र सधता है? के प्रत्युत्तर में सरोजा जी ने कलाओं का प्रारंभ लोकोन्मुखी बताया। स्वांतः सुखाय प्रकट होने वाली लोककला के बाद में शास्त्र आता है। डॉ शांति जी ने लोकगीतों में सभी विषयों के उपस्थित होने की चर्चा की।डॉ मालिनी जी ने लोक संगीत की सहज प्रकृति के कारण उसे बोधगम्य माना तो प्रतिभा प्रहलाद जी ने कला को ईश्वर के प्रति समर्पित मानकर उसे केवल मनोरंजन नहीं कलाकार के मनोधर्म के अनुसार प्रस्तुत होने वाला माना। शास्त्रीय गायिका पूर्णिमा जी ने सभी कलाओं को ललित कलाओं का समेकित रूप माना और कहा कि शास्त्रीय अनुशासन भाव की गहनता के लिए आवश्यक होता है।
‘संगीत के लोक ‘की परिचर्चा में जो लोकसत्य उभरे उनमें हमारे लिए यह बहुत सुखद आश्चर्य से भरा था कि बिहार के छठ पूजा के लोकगीतों में छठ मैया का बायना बांटने के लिए परिवार में बेटी होने की कामना की जाती है।
मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी से जुड़े सत्र में रोहित सरदाना, ऋचा अनिरुद्ध और शेफाली वैद्य की परिचर्चा में तीनों पत्रकारों की धारदार बानगी ने पूरी संगोष्ठी को अंत तक ज्वलंत मुद्दों से जोड़े रखा।कथित क्रांतिकारी पत्रकारिता से लेकर सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया पर जितने प्रश्न उठाए जा सकते थे उठाए गए और बड़ी साफ़गोई से उनके जवाब भी सामने आए। शेफाली नें जब मरने वालों में/ दंगा करने वालों में, एक का धर्म बताने और दूसरे का धर्म ना बताने की निरंतरता के मुद्दे को सामने रखा और ऋचा अनिरुद्ध नें उसके समर्थन में कहा कि समाज को सबसे अधिक धर्म और जाति के नाम पर बांटने का काम मीडिया ने किया है। तो रोहित ने ‘ बांटने का काम राजनेता करते हैं मीडिया तो सिर्फ़ दिखाता है’ कहकर मीडिया का बचाव भी किया परंतु वर्णनात्मकता के ढंग को बदल कर, सामाजिक जिम्मेदारी के साथ सही दिशा में ले जाने की सिफारिश भी की। कुल मिलाकर सोशल मीडियाऔर मेनस्ट्रीम मीडिया की वर्तमान चुनौतियों पर खुलकर चर्चा और चिंतन हुआ।
‘ नारी विमर्श’ के बदलते स्वरूप पर मालिनी अवस्थी, साध्वी भगवती सरस्वती, लुबना आरिफ़ और नलिनी जी की परिचर्चा को सुनकर एक सुखद अनुभूति हुई क्योंकि नारी विमर्श के नाम पर अधिकांश चर्चाओं को हमने उसे पुरुष की बराबरी पाने से जुड़े महिलाओं के आक्रोश और पश्चिमी देशों के संदर्भों से जुड़ा पाया था। यह चर्चा भारतीय नारी के संदर्भ में, भारतीय परिप्रेक्ष्य में उसकी स्थिति और समस्याओं पर हुई। कैलिफ़ोर्निया से 23 वर्ष की आयु में भारत पहुंच कर पिछले 25 वर्षों से यही के रंग में रंगने वाली साध्वी सरस्वती जी ने बहुत सरल शब्दों में नारी के प्रति अपने भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण को रखा। उन्होंने कहा , वहाँ नारी को, कपड़े वेशभूषा, बालों और देह के स्वरूप(फ़िगर) तक सीमित देखा करती थी। भारत आई तो देखा यहां नदियों तक को माँ कहकर बुलाया जाता है। शक्ति को पहला स्थान दिया जाता है। राधा कृष्ण, सीताराम यहां तक कि त्वमेव माता च पिता वाले मंत्र में भी पहले माता का ज़िक्र आता है। नारी का यह रूप अद्भुत है। हाँ, गोरेपन के लिए दिखाई देने वाले पागलपन पर उन्हें आपत्ति थी। इस सत्र की खूबसूरती यह थी कि यहां नारी का चिंतन पुरुष की प्रतिद्वंद्वी नहीं वरन् समान सहभागी के रूप में ही चर्चा का मूल विषय बना और स्वयं स्त्री द्वारा अपनी सकारात्मक शक्तियों का पुनःअन्वेषण – मूल बिंदु । मेरा दृष्टिकोण भी यही है कि अर्धनारीश्वर की परिकल्पना वाली भारतीय संस्कृति में इसी सत्य तक पहुंचने को ही स्त्री सशक्तिकरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

जमीन छोड़ती परंपराएं- परिचर्चा में नीरजा माधव जी ने प्रतीकात्मकता का सहारा लेकर,भारतीय संस्कृति को ‘बरगदी संस्कृति’ कहते हुए स्पष्ट किया किया कि भारतीय परंपरा ना ज़मीन छोड़ती है ना ही ऊर्द्धवगामी होना छोड़ती है। परंपरा के नाम पर कुछ परिस्थितिजन्य रूढ़ियों (जैसे सती प्रथा आदि) भारतीय परंपराओं का नाम दे दिया गया है जो ग़लत है। इसके लिए परंपरा और रूढ़ियों का अंतर सब को समझना और समझाना होगा। भारतीय संस्कृति दूर्वा संस्कृति है अतःहर स्थिति में जीवंत रहती है। यही कारण है कि हमारी स्मृतियों में राम- जन्म और कृष्ण-जन्म तो हैं परंतु उनके महाप्रयाण की तिथियां नहीं हैं।
बाबा सत्यनारायण मौर्य जी ने भारतीय संस्कृति को सर्जन और विसर्जन संस्कृति मानते हुए परंपरा में परिवर्तन को उसका सहज रूप माना।
प्रसिद्ध रंगकर्मी सलीम आरिफ़ जी नें परंपराओं के ज़मीन छोड़ने की बात को बहुत ही खूबसूरती से कहा कि, ज़मीन भारतीयता है। परंपरा नदी की तरह अनवरत प्रवाह है। नदी किनारे काटती है, नए बनाती है। हर युग में, समसामयिक परिवेश से परंपराएं प्रभावित होती हैं। वर्तमान में, जैसे कहीं आर्थिक प्रभावों के कारण पुरानी परंपराएं टूटती जा रही हैं तो कहीं सोशल मीडिया (फ़ेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप )और मोबाइल के प्रभाव के कारण सोचने से पहले टिप्पणी करने की आदत बढ़ रही है। नाटकों में वाचिक परंपरा की कमी से भाषा की शुद्धता खोने के साथ- साथ संबंधों में सत्कार के भाव में अंतर आ रहा है।
दर्शक हाथी जी परंपराओं के ज़मीन छोड़ने का कारण- दूसरों के जैसे बनने की प्रवृत्ति को मानते हैं। उन्होंने विज्ञान के आधार के बिना परंपरा बनाना निरर्थक माना है।
मैं मानती हूं कि यह अकाट्य सत्य है कि भारतीय संस्कृति बरगद और दुर्वा की संस्कृति है। इसी संस्कृति में चरैवेति चरैवेति का सिद्धांत मिलता है आरिफ़ जी की चिंता पर चिंतन अत्यंत आवश्यक है।इन सब के परिणाम भारतीय संस्कृति पर दूरगामी होंगे इसलिए मेरा मानना है इनके समाधान भी शीघ्र खोजने होंगे और वैज्ञानिक रुझान व तत्परता के साथ।
कला परंपराओं की सामाजिक जिम्मेदारी सत्र में, सभी मूर्धन्य कलाकारों ने अपनी-अपनी कला साधना के क्षेत्रों के अनुसार ‘कला परंपराओं की सामाजिक ज़िम्मेदारी’ को परिभाषित किया ।
वामन केंद्रे जी ने भारत की समृद्ध नाट्य परंपरा का उल्लेख करते हुए कलाओं को संवेदनशीलता बढ़ाने का माध्यम बताया। प्रारंभ में ही देवताओं को अनुशासित करने के लिए पंचम वेद नाटक का जन्म हुआ अतः इसकी ज़िम्मेदारी समाज के परिप्रेक्ष्य में हमेशा से है और रहेगी।
वसीफ़ुद्दीन डागर जी ने ध्रुपद गायकी की समृद्ध परंपरा के अनुरूप स्वर कोआत्मा का भोजन कहा। इस भोजन को अपने आराध्य के सामने कैसे परोसें, इसका निर्णय कलाकार का है। कला-परंपराओं के बरगद के पेड़ की जड़ों को आज को भीऔर आने वाले कल के समाज को भी जोड़ने का काम करना है। कलाकार कल को आकार देता है, कला बचेगी तो कलाकार भी बचेगा।
शारदी सैकिया जी ने श्रीमंत शंकर देव द्वारा प्रारंभ किए ‘सत्रिया नृत्य’ का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि शंकर देव जी ने तत्कालीन सामाजिक परिवर्तन के लिए पहले साहित्य रचना की फिर उसकी प्रस्तुति सत्रिया नृत्य के रूप में की ताकि लोगों को एक सूत्र में बांधा जा सके। सामाजिक जिम्मेदारी के अनुसार कला अपना रूप बदलती है जैसे प्रारंभ में यह नृत्य कुछ पुजारियों के द्वारा ही किया जाता था और आज यह आम लोगों की पहुंच में है।
सच्चिदानंद जोशी जी कलाओं को संवेदनशीलता से जोड़ते हैं। उन्होंने कहा, सामाजिक ज़िम्मेदारी के रूप में विद्यार्थी वर्ग को सिखाई जाने वाली पाठ्येत्तर सहायक ( सी.सी.ए) कलाओं के नाम पर जो कुछ सिखाया जाता है वे वास्तव में कलाएं नहीं हैं। वर्तमान जीवन में सपाटीकरण है।
श्याम शर्मा जी ने कहा कलाओं के बिना जीवन यात्रा अधूरी रहती है। मानव की संवेदना ही अजंता एलोरा के चित्र व मूर्तियों के लिए उत्तरदायी है कलाएं जीवन जीना सिखाती हैं।
राजेश्वर आचार्य जी ने अपनी ओजस्वी वाणी में स्पष्ट किया कि ‘स्वर’ अमूर्त व्योम में व्याप्त है। स्वर उत्पन्न नहीं होता, उपलब्ध होता है। इसलिए भारतीय संगीत चेतना से जुड़ा है उसकी यात्रा पदार्थ से तत्व की ओर चलती है। निरंतर परिष्कार और परिमार्जन से किया गया अर्जन ही संस्कृति बनता है।
कला परंपराओं की सामाजिक ज़िम्मेदारी के प्रश्न की जिज्ञासा के परिशमन की प्रक्रिया में हमें अद्वितीय आनंद का बोध हुआ।
“संस्कृति विद्वत कुम्भ” के सभी परिचर्चा सत्रों ने हमें यह बात समझा दी कि अपनी- अपनी कलाओं को समर्पित इन महान पुरोधाओं में नाटक, संगीत,नृत्य, गायन, चित्रकला,स्थापत्य और साहित्य आदि समग्र कला-परंपराओं को भविष्य के हाथों में सौंपने के लिए जो ललक है वो समाज को संवेदनशील और मानवीय गुण संपन्न बनाने के लिए है। कला, आध्यात्म और राजनीति की त्रिवेणी के इस वैचारिक-मंथन से जो अमूल्य रत्न निकले हैं उनका प्रकाश वासुधैव कुटुम्बकम् का मार्ग प्रशस्त करेंगे ।यह सत्य है कि हमारे लिए “संस्कृति विद्वत कुम्भ” प्रयागराज के कुंभ का एक अनूठा पक्ष है परंतु यह भी सच है कि इस अभूतपूर्व कुम्भ में हम जहां जा पाए सभी अपने आप में अद्वितीय ही थे।
हमारे लिए अविस्मरणीय हैं मेला क्षेत्र के सेक्टर 19 में बना “संस्कृति ग्राम”। जितनी अतुलनीय परिकल्पना उतना ही अतुलनीय है इसका साकार स्वरूप। संस्कृति ग्राम में प्रवेश करते ही दिखाई देता है पवित्र कुशा का प्रयोग। कुश से बनी हुई संस्कृति ग्राम की चारदीवारी, चारदीवारी के साथ ऊंचे -ऊंचे जगमगाते दीपस्तंभ भी कुश से ही बने हैं – – कुशा को कुशलता से कलात्मकता का अनुपम स्वरूप – यहां देखने को मिला। प्रवेश द्वार पर ही सागर मंथन की कथा का मूर्तिमंत स्वरूप दिखाई देता है और द्वार पर विशाल कुंभ स्थापित किया गया है।
भारत के पूरे इतिहास के एक-एक काल के व्यापक खंड को एक-एक बड़े गलियारे में समेटा गया है।
भारत के समग्र इतिहास को,प्रामाणिकता से सजीव बनाती प्रतिकृति हों या उस काल खंड के सिक्के,मुद्रा, मोहरें – – – – सब कुछ बहुत कलात्मक और बहुत व्यवस्थित है।मानचित्रों के साथ,पुरातात्विक खुदाई में मिली विभिन्न कालों के अवशेष, शिला खंडों पर उद्धृत आलेखों ने हमें चमत्कृत किया। प्रागैतिहासिक युग से प्रारंभ करके, वैदिक काल, रामायण काल मौर्य काल गुप्त काल आदि को जीवन्त बनाती यहां की मूर्तियां व चित्र अद्वितीय हैं। इतिहास की पुस्तकों से ज्यादा सरल ढंग से भारतीय इतिहास को समझाने के लिए संस्कृति ग्राम अकेला ही काफ़ी है। मेरे जैसे भारतीय पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए यह संस्कृति ग्राम बहुमूल्य खज़ाने से कम नहीं है। इसे सही ढंग से देखने और इसके बारे में बारीकी से समझाने के लिए ,मैं हृदय से धन्यवादी हूं ‘राहुल नील’ की जो संस्कृति ग्राम के निर्माण की प्रक्रिया के प्रारंभ से इसके साथ जुड़े हुए हैं।

हमारे लिए इस दिव्य कुम्भ का एक और अमूल्य रत्न है कुंभ मेले के सेक्टर 7 में स्थित ” अपना पूर्वोत्तर ” संस्कार भारती का शिविर। प्रवेश द्वार के एक ओर त्रिपुरा की आश्चर्यचकित करने वाली उनाकोटि के मैगालिथिक मूर्तियों के अद्भुत संसार से “उनाकोटेश्वर” की प्रतिमा की प्रतिकृति देख कर हम अवाक रह गए। मन में एक ही भाव था ; वहां ‘उनाकोटि’ में विशाल पत्थरों पर ‘एक करोड़ में एक कम’ उकेरी गई शिव परिवार की विशाल मूर्तियां विश्वभर के लिए आश्चर्य की वस्तु हैं तो इनमें से एक मूर्ति की प्रतिकृति को कुंभ में स्थापित करना पूर्वोत्तर के कलाकारों का अनुपम कौशल ही दर्शाता है। प्रवेश द्वार पर पूर्वोत्तर के प्रदेशों के प्रतीक चिन्हों को दर्शाते हस्त शिल्प का बहुरंगी वैभव ईशान कोण में बसे आठों राज्यों के कला प्रेमी लोगों के बारे में बहुत कुछ बयान कर रहा है।परिसर में पहुँचने पर कार्यक्रम के संयोजकों नें जिस आत्मीयता से, परंपरागत स्वागत किया वह सदा हमारी अमूल्य निधि रहेगा।

भीतर परिसर में मंच पर पूर्वोत्तर से आए कलाकारों का और मंडप में बैठे दर्शकों का अपरिमित उत्साह मुझे इस बात की घोषणा करता दिखाई दिया कि कुंभ में छोटे पूर्वोत्तर की एक झलक देखने को शेष भारतीय इतने उत्साहित हैं। मंच पर गायन, नृत्य, नाटक की भाषा चाहे अपरिचित थी परंतु मैंने देखा सभागार में बैठे हर व्यक्ति के पांव ताल पर थिरकने को बाध्य थे। सभागार में बैठे मध्य प्रदेश से आए परिवार से मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि वे कुंभ में ही रह रहे हैं और रोज़ थोड़ा समय निकाल कर यहां आते हैं। कारण पूछने उन्होंने जो कहा वो मेरे लिए बहुत प्रसन्नतादायक था।
” हमारी बिटिया चौथी में और बेटा नवीं कक्षा में पढ़ता है। दोनों के पाठ्यक्रम में पूर्वोत्तर के राज्य हैं। पढ़ाने के लिए हमने भी इन राज्यों के बारे में पढ़ा तो, पर हमारी जानकारी किताबी थी। यहां आकर, ‘अपना पूर्वोत्तर’ में, हमने फर्स्ट हैंड अनुभव भी लिया राज्यों के बारे में जाना और सबसे बड़ी बात कि यहां के प्यारे, सीधे-सच्चे लोगों से मिलकर हमारी कई ग़लतफ़हमियां भी दूर हुई। ” यह संदेश मेरे लिए बहुत सकारात्मक है क्योंकि पूर्वोत्तर मेरा बहुत प्रिय स्थान है। मैं जानती हूं भारत के इन आठों प्रदेशों और शेष भारत के बीच वैदिक काल से ही गहरा संबंध है। वास्तव में पूर्वोत्तर के 8 राज्यों से आए 3000 कलाकारों द्वारा 50 दिन में 500 प्रस्तुतियां कुंभ में आए दर्शनार्थियों के सम्मुख पूर्वोत्तर के राज्यों की अपनी कला संस्कृति पर आधारित कार्यक्रमों की मनोहरी प्रस्तुतियों और पूर्वोत्तर में बिखरे रामायण महाभारत काल के आज भी मौजूद स्थानों से जुड़ी कथाओं ; जैसे अरुणाचल की राजकुमारी रुक्मिणी व श्रीकृष्ण की विवाह कथा, प्रथम महिला चित्रकार चित्रलेखा द्वारा अपनी सखी के लिए अनिरुद्ध का चित्र बनाना, असम में श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के बाणासुर की पुत्री उषा से विवाह की कथा,मेघालय की वीर योद्धा राजकुमारी से अर्जुन का विवाह आदि चित्रकारों द्वारा बनाए गए चित्रों,आदि के माध्यम से समग्र भारत को एकता के सूत्र में बांधने और भारतीय एकात्मता की अविच्छिन्न धारा से जोड़ने का काम आध्यात्म एवं आस्था के इस पुनीत महापर्व पर किया है।

14 फरवरी को सुबह से हल्की बूंदाबांदी होने लगी तो लगा इस दिव्य कुम्भ में आकाश गंगा भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा लेना चाहती हैं। हमारे लिए आज कुंभ व्यक्तिगत रूप में वसुधैव कुटुम्बकम् चरितार्थ करने वाला सिद्ध हुआ। परमार्थ निकेतन में जूट के सुंदर प्रयोग से सजे हुए परिसर को हमने आज जी भर कर देखा। अत्यंत मनोरम आवासीय शिविर में जूट से आवृत दीवारों पर सफेद रंग से की गई चित्र-सज्जा पूरे वातावरण को शांत और पावन बनाए हुए थे। परिसर में भारतीय जीवन मूल्यों को दर्शाते श्लोक अंकित थे। हम इस वातावरण की पावनता को आत्मसात करने में मगन थे। प्रांगण में देशी-विदेशी सभी पर आध्यात्मिक आनंद का उजला प्रकाश दिखाई दे रहा था। आनंद भाव से सब एक दूसरे से मिल रहे थे। अभिवादन कर रहे थे। तभी ना जाने किसी प्रेरणा के कारण या प्रारब्ध के कारण, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि जी ने हमें और अनिल जी को अपने पास बुला कर आशीर्वाद दिया और साध्वी भगवती जी से हमें विदेशी समूह से मिलवाने और उनके साथ चित्र लेने का निर्देश दिया। हम संस्कृति विद्वत कुम्भ में स्वामी चिदानंद जी, साध्वी भगवती जी से प्रभावित हुए थे परंतु उनसे हमारा व्यक्तिगत परिचय नहीं था। हम कुछ समझते उससे पहले ही साध्वीजी हमें विदेशियों के उस समूह के बीच ले गईं। हमने भी मन ही मन दोहराया—- ‘होई है वही जो राम रचि राखा, को करि तर्क बड़ावहिं साखा।।
बातचीत से पता चला कि वे ऑस्ट्रिया और मैक्सिको से आए हैं।कुंभ के मेले को लेकर वे सभी बहुत उत्साहित थे। उनके आने के स्थान को जानने और वेशभूषा देखने के बाद मैंने सहज भाव से अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछा कि क्या वे सब ‘एज़टेक’ हैं। हमारे साथ खड़े सात कुछ लोगों ने हमारा हाथ पकड़कर अपना एज़टेक होना स्वीकार किया। वे बहुत खुश थे। मेसोअमेरिकन सभ्यता की नाग पूजा का हवाला देकर मैंने भगवान शिव के नाग की बात की।हमने इन समानताओं को ‘वीऑल आर वन फैमिली’ के बंधन में बांधा। पूरा माहौल जब अपनेपन से भर गया तब हमने समूह की सबसे बड़ी महिला, जो विशेष परिधान पहने हुए थीं उनसे कहा कि उनका परिधान हमारे हिमाचल के परिधान से मिलता जुलता है। वे अपनी भाषा के अतिरिक्त कोई भाषा नहीं जानती थी इसलिए समूह के एक युवक ने हमारे बीच दुभाषिये भूमिका निभाते हुए मेरी बात उनको समझाई। उन्होंने गर्मजोशी से मेरा हाथ पकड़ा मेरे प्रदेश के बारे में पूछा। मैंने बताया कि हिमालय के अंचल में मेरा छोटा सा गांव है। हम भी ऐसे ही पर सिर पर चांदी के आभूषण आपने पहने हैं हम नहीं हम से ऊंचाई पर रहने वाले किन्नौर के लोग पहनते हैं। हम दोनों के बीच के दुभाषिये ने जैसे ही यह बात उन को समझाई वे भावुक हो गईं। युवक ने मुझे कहा ‘शी वांटस टू हग यू’ मैंने उनकी इस आत्मीयता से भरी बात को जैसे ही स्वीकारा, उन्होंने मुझे ऐसे गले लगाया जैसे मैं उनके अपने परिवार की कोई बिछड़ी कोई सदस्या हूं। उनकी आंखें भर आई थीं।उनका स्नेह मुझे अभिभूत कर रहा था। वे मुझे छोड़ना ही नहीं चाहती थी। उन भावपूर्ण क्षणों को मैं भी शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकती। वे हमें बार – बार गले लगातीं और कुछ बोलती जा रही थीं। बाद में उस युवक नें मुझे बताया कि वे कह रही थी कि ‘हिमालय उनके यहां ईश्वर का आवास है , उनका हृदय है।वहां रहने वाले लोग ईश्वर के हृदय के सबसे निकट हैं।’उन्होंने कई बार मेरे हाथों को चूमा। कई बार गले लगाया। अगर स्वामी जी नाश्ते के लिए हमें अंदर ना बुलाते तो वे मुझसे और बातें करना चाहती थीं। विदा मांगने पर– हम सबने आत्मीयता से एकदूसरे को धन्यवाद दिया। हमारा सौभाग्य रहा कि इन अभूतपूर्व क्षणों के चित्र हमारे पास हैं। दिल्ली वापस आने पर यही विचार आया कि स्वामी जी ने क्या इस आत्मीयता भरे परिवेश का साक्षी बनाने के लिए हमें वहां भेजा था!!
हम उसी शाम दिल्ली अपनी यात्रा पर निकल पड़े थे पीछे छूटता जा रहा था मेले की भव्यता में चार चांद लगाता अनोखा पान्टून पुल, सब ओर जगमगाती सड़कें, शिविरों के रंग बिरंगी रोशनी भरे परिसर। रोशनी की दीपों से प्रकाशित तटों के बीच रुपहली लहरों के साथ बहती गंगा- यमुना और अदृश्य सरस्वती की अविरल जलधारा।
तीन दिन की अल्पावधि में मैं इस कुंभ से जो अनमोल निधियां बटोर कर लाई ! अनुभव और अनुभूतियों जो सत्य मैंने यहां पाया!! उसके आधार पर निश्चय ही, हमारे लिए यह कुंभ, अभूतपूर्व कुंभ है। चिरंतन काल से बहती भारतीय संस्कृति के सर्वे भवंतु सुखिनः के चिंतन की अविरल धारा है। समसामयिक संशोधनों के साथ विश्व बंधुत्व की, प्राणी मात्र के प्रति समभाव की इस अमूल्य विरासत को परिष्कृत कर, नई पीढ़ी के हाथों सौंपने का संकल्प-पर्व है।
– – यह अभूतपूर्व कुंभ हमारे लिए अविस्मरणीय अनुभव है ।

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