भारत रत्न श्री चण्डिकादास अमृतराव (नानाजी) देशमुख

संस्कार भारती के जनक, स्वावलम्बी भारत
के स्वप्नद्रष्टा और ग्राम स्वराज के प्रयोगकर्ता
भारत रत्न श्री चण्डिकादास अमृतराव (नानाजी) देशमुख (1916-2010)

संस्कार भारती की संकल्पना ‘संस्कृति’ से सम्बद्ध है। साधारण व्यक्ति ‘संस्कार’ को शिक्षा का पर्याय समझता है। जहाँ शिक्षा का सम्बन्ध बुद्धि से है, वहाँ संस्कार का सम्बन्ध मन, हृदय और आत्मा से है। ‘संस्कार’ अनेक तत्त्वों का सामूहिक प्रतिफल होता है। ये तत्त्व आंतरिक भी होते हैं और बाहरी भी; व्यक्तिपरक भी होते हैं और वस्तुपरक भी। ऐसे तत्त्वों में कला का स्थान सर्वोपरि है। ‘संस्कार भारती’ कला के माध्यम से ‘संस्कार’ रोपण के ध्येय को पूरा करना चाहती है।
मानव के सच्चे संसार का, सत्यं शिवं सुन्दरम् के चिन्मय संसार का सृजन ही कला का धर्म, कर्म और मर्म है। संस्कार भारती का लक्ष्य भी मूल्य-आधारित कला और मनोरञ्जन द्वारा व्यक्ति का विकास करना है। प्राचीन और आधुनिक के समन्वय और प्रतिभाशाली युवा कलाकारों को नये प्रयोग की भूमि प्रदान करने में संस्कार भारती का विश्वास है, ताकि भारत की कला-धरोहर नित आगे बढ़ती रहे और नया क्षितिज प्राप्त करे।

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