सिंहस्थ 2016, उज्जैन

प्राचीन हिन्दू सामाजिक विचारों और मनीषियों ने राष्ट्रीय एकता और अखंडता  को बनाए रखने के लिए अनेक प्रकार के धार्मिक और सामाजिक प्रबन्ध किए थे ,जिसके परिणाम स्वरूप  राष्ट्रीय एकता की एक ऐसी अन्तः सलिला अजस्त्रधारा बह निकली थी जिसने अनेक सहस्त्र शताब्दियों तक सम्पूर्ण देश को एक सूत्र में बांध कर रखा है, उसी में से एक है कुंभ जहां प्राचीन काल से ही भारत के सामूहिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता है । ये भारतीय संस्कृति की सामूहिक पूजा और आराधना के भाव को व्यक्त करते है । इन्ही भाव के प्रस्फुटन से निकली संगम नगरी में आयोजित इस साल का कुंभ बहुत कुछ सन्देश देता है ……………

#कलाओं का सामंजस्य …

आधुनिकता के इस दौड़ में जहां दुनियां मुट्ठी में है लेकिन मुट्ठी में सिमटी दुनियां आभासी दुनियां है । और इस आभासी दुनियां में जब परस्पर एक दूसरों को प्रत्यक्ष रूप से कलाओं के माध्यम से जुड़ने का अवसर यहां मिलता है।इस साल के कुंभ में  सरकार और सामाजिक संगठनों ने अपने-अपने स्तर पर कला और कलाकारों को अवसर दिया जिससे जनसामान्य को विभिन्न प्रकार के कलाओं औऱ कलाकारों से परिचय होता चला गया । लेकिन यह भी महत्वपूर्ण विषय है कि पूर्व के जहां कुम्भ सामाजिक सांस्कृतिक विरासत को जनसामान्य तक पहुँचाने का माध्यम था ,और अब यह माध्यम सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने में सहायक है ..

#कुम्भ जाति का नहीं धर्म का परिचायक …

प्रो. के बी रंगास्वामी आयंगर ने कृत्यकल्पतरू के तीर्थविवेक्चनकाण्ड की भूमिका में सत्य ही कहा है कि “जहां राजनीतिगत महत्त्वकांक्षा ने देश को एकीकृत अथवा खण्डित  करने का कार्य किया है ,वही तीर्थयात्रियों ने धार्मिक विश्वासों पर आधारित शाश्वत मूल्यों से युक्त एकता का सूत्र पिरोया है । चतुर राजनेताओ के द्वारा भारत की एकता प्राप्त करने से पहले ही तीर्थयात्रियों के चरणों ने अखण्ड हिंदुस्तान की संरचना कर दी थी । आज जब इस कुम्भ मेले को हम सब ने देखा तो जो बातें कल तक किताबी लगती थीं वो आज वास्तविकता को आधार बनाए हुए है ……..

जाति व्यवस्था को तोड़ता हुआ कुंभ ..

तीर्थराज प्रयाग में आयोजित कुम्भ सामाजिक समरसता को नए आयाम दे रहा है। लोक आस्था के इस माह पर्व में करोड़ों लोग बिना किसी भेद-भाव के एक स्थान पर, एक पावन त्रिवेणी के तट पर रह रहे हैं। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में भीतर तक घर कर गयी उंच-नीच, छुआछूत की भावना यहां नहीं देखी जा सकती है ,ऐसे में यह कुम्भ समाज को समरसता का सन्देश देती प्रतीत होती है।

इस बारे में हमारी बातचीत प्रख्यात इतिहासकार और  इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देवी प्रसाद दूबे से हुई  उन्होंने कहा कि , “जब देश के विभिन्न भागों से आये लोग एक संत के सानिध्य में एक शिविर में परिवार की तरह रहकर कल्पवास कर रहे हैं जबकि उन्हें एक दूसरे की जाति तक पता नही होता और कुम्भ की यही विशेषता है कि यहां लोग इसे जानना भी नहीं चाहते। समाज को यह आइना है।”

इस बात की पुष्टि करने हम बांदा से आयी सफाईकर्मी गुंजन से मिलने पहुंचे। सेक्टर-6 में इस्कॉन शिविर से सटे इनके बस्ती में बांदा से आये करीब 300 सफाईकर्मी अपने परिवार के साथ पिछले 2 महीने से रह रहे हैं पूछने पर गुंजन बताती हैं कि, “सफाई के लिए हमलोग शिविरों में बिना रोक टोक साधू संतों के कमरों तक जाते हैं और वे भी हमें उचित सम्मान देते हैं। जबकि हमारे गांव में ऐसा नहीं होता।” यहां रहने वाले और भी लोग इस बात से खुश हैं कि उनकी अहमियत को समझा जा रहा है।

फिर हम मिलने पहुंचे स्वामी गिरीसा नन्द से स्वामी स्वमं तथाकथित दलित समुदाय से आते हैं। ये पूछने पर वे थोड़े नाराज़ होकर कहते हैं, “यहां किसी को जाति से मतलब नही सभी परम पिता परमेश्वर के संतान हैं और माता -पिता अपने संतान में कोई भेद नहीं करते।” वे खुद को दलित संत की जगह केवल संत कहलाना पसंद करते हैं।

इस पूरे मेला क्षेत्र में आपको सैकड़ों भंडारे मिल जायेंगे जहां सभी धर्म-जाति के लोग एक साथ बैठ कर भोजन ग्रहण करते हैं।

ऐसे में एक ओर जहाँ हमारा समाज छूआछूत जैसे विभत्स कुरीतियों से जकड़ा हुआ है ये कुम्भ हमें समता, समरसता की नयी दिशा दिखा रही है।

देखती दुनियां बदलता भारत ……….

कुंभ दो भाई के अलग होने का सिर्फ फ़िल्मी कथानक नहीं है । यह बदलते जीवन शैली का साधन स्थल है । कुंभ में आए एक विदेशी पर्यटक से बातचीत में उन्होंने कहा कि “भारत शान्ति और योग ,वेद जैसे ज्ञान का खाजाना है । जिसे दुनियां अब धीरे- धीरे ही सही पर स्वीकार कर रही है । भारत भाव का सामन्जय पैदा करता है । आज जहां डिजिटल दुनियां के माध्यम से कुम्भ को दुनियां देख रही है तो लोगों को लगता है कि “विश्व शान्ति भारत के ही परम्परा में समाहित है “……

भूखा कोई नहीं रहता है यहां ……

कुम्भ में लाखों लोग प्रत्येक दिन अपना भोजन करते हैं कोई भी व्यक्ति यहां भूखा नहीं सोता है । जगह-जगह भोजन की व्यवस्था की गई है हर व्यक्ति को यहां भोजन प्राप्त होता है मजदूर से लेकर दूर – दराज़ से आए लोगों को भी भोजन कराया जाता है | हर अखाड़े में प्रतिदिन भंडारे का आयोजन किया जाता है जहां लाखों श्रद्धालु भोजन करते हैं। यहां भूख से किसी व्यक्ति की मौत नहीं होती है। यह कुम्भ की सबसे अलग और सबसे अद्भुत बात है । भंडारा चला रहे एक संत ने कहा कि “जितने भी व्यक्ति यहां आते है हम उन्हें भोजन कराते है और हमारे यहां कभी भी प्रसाद की कमी नहीं होती है ….

#रोजगार सर्जन करता कुम्भ…

जब हमारी टीम प्रयागराज के कुछ युवाओं से मिली तो सबसे पहली प्रतिक्रिया उनकी यह थी कि यहां के युवाओं को रोजगार कुम्भ ने दिया है । जो लड़के कल तक गलियों में चक्कर काट रहे थे । वो किसी न किसी जगह कुंभ में काम कर रहे है । वही कुंभ में काम कर रहे सफाई कर्मचारी रमेश ने कहा कि यहां 11 हजार लोगों को सफाई कार्यो में लगाया गया है। प्रत्येक कर्मचारियों को 295 रूपये प्रत्येक दिन के हिसाब से मिलता है । वहीँ स्वछता के लिए सरकार द्वारा प्रशिक्षित की गयी टीम लोगों को शौचालय के प्रति जागरूक कर रही है। इन कार्यकर्ताओ को प्रतिदिन 500 रूपये दिया जाता है। इन कर्मचारियों की संख्या लगभग 1600 है । 

 डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में पंडित नेहरू ने कहा है कि “मैं अपने शहर इलाहाबाद या हरिद्वार में कुम्भ पर्व पर  स्नानार्थ जाया करता या और कुम्भ स्नान करने के लिए सम्पूर्ण भारत के सभी भागों से लाखों लोगों को पूर्ण श्रद्धा से आते हुए देखता था मैं चकित होकर सोचता था कि यह कैसा विश्वास जो हमारे देश के लोगो की अनगिनित पीढ़ियों को यह प्रसिद्ध गंगा नदी अपनी तरफ आकर्षित करती है “

अर्थात पण्डित नेहरू को भी एहसास हो गया था कि हिन्दू जन मानस अपने परम्पराओं के द्वारा अपने मान्यताओं के द्वारा अपनी बातें बड़े स्तर पर करता है और जनसामान्य के मन मस्तिष्क में स्थापित करता है। 2019 का कुंभ इस लिए भी अहम और अद्वितिय है कि इस कुंभ में भारत की सांस्कृतिक विरासत को पुनः स्थापित कर दिया गया और सरकार और समाज द्वारा इसमें सहयोग किया गया । सरकार का प्रगतिशीलता धार्मिक आधार पर भी दुनियां को दिखाया गया …..

इस कुंभ के तैयारी के अवसर पर जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कुंभ शुरू होने से पहले पहले सभी गंदगियों को गंगा में प्रवाहित होने से रोका जाएगा। और सरकार ने इस पर काम कर गंगा के शुद्धि करण में सहयोग किया । पंडित नेहरू जिस भावना की बात करते है उस भावना को कहि न कही योगी आदित्यनाथ ने साकारात्मक भाव प्रदान किया है ……

इलाहाबाद का नहीं प्रयागराज का कुंभ है …

बदलते परिदृश्य में जब अपना मूल वापस आए तो आनन्दित होना तो आवश्यक ही है। और यह पहला अवसर है जब हिन्दू समाज ने अपने प्रयाग में कुंभ मनाया है। जब कोई अपने स्तवित्व को पुनः प्राप्त करता है तो उसकी खुशी जन सामान्य की ख़ुशी होती है और यह प्रयाग राज नामकरण हिन्दू समाज के संस्कारों का पुनर्स्थापन है ……….

कुंभ केवल गंगा ,यमुना और अन्तः सलिला सरस्वती का का ही संगम नहीं होता है वरन माघ मास में यहां होता है -समस्त तीर्थो का संगम ,देव,दानव ,गंदर्भ ,ऋषि और सिध्दों का संगम । यह समागम वैसे तो प्रतिवर्ष होता है ,किन्तु पर्व के अवसर पर इसकी छटा कुछ निराली ही हो जाती है ।  कुंभ सिर्फ भीड़ नहीं है भारतीय संस्कृतियो और समरसता का सबसे बड़ा उदहारण है ……

 

हर्षित कुमार 

ज्योति सिंह राजपूत 

ऋचा त्रिगुणायत

मृत्युंजय कुमार 

 

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